बेवफा तुर्की – आपरेशन सिंदूर (Ind Pak Conflict) Sindoor, Turkey
बेवफा तुर्की – आपरेशन सिंदूर (Ind Pak Conflict): एक सच्ची कहानी
तुर्कुीः -
कुछ साल पहले तक तुर्की को यूरोप और एशिया का पुल माना जाता रहा है । एक ऐसा देश जो संस्कृति, व्यापार और राजनीति के बीच संतुलन बनाने की हर संभव कोशिश कर रहा था। लेकिन आज तुर्की एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसकी अर्थव्यवस्था धराशायी हो चुकी है, और उसकी विदेश नीति उसे दुनियाभर में आलोचना का पात्र बना रही है । खासकर भारत में, क्योकिं जिस थाली से तुर्की ने खाया उसी थाली में खाकर छेद किया ।
ऑपरेशन दोस्तः -
हाल ही में तुर्की ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष में खुलकर पाकिस्तान का समर्थन दिया बात किसी भी देश के साथ खड़े होने की या न होने की नहीं है । बल्कि उसने पाकिस्तान को ड्रोन और युद्धपोत के साथ साथ उनको चलाने के लिए ऑपरेटर जवान भी तुर्की ने मुहैया करवाए यह वही तुर्की है जिसे दो साल पहले आए विनाशकारी भूकंप में भारत ने मेडिकल टीम और राहत सामग्री भेजकर तुर्की औऱ सिरिया के लोगों की जानें बचाई थी। भारत का “ऑपरेशन दोस्त” तुर्की की मदद के लिए था लेकिन बदले में तुर्की ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा।
तुर्की की गिरती हुई अर्थव्यवस्थाः -
आज तुर्की की मुद्रा लीरा का हाल इतना खराब है कि 2014 में 1 अमेरिकी डॉलर 2 लीरा में मिलता था, और आज 2025 में वही डॉलर 38 लीरा में मिल रहा है। यानी तुर्की की मुद्रा ने अपने मूल्य का 90% खो दिया है।
इस तबाही का जिम्मेदार कोई और नहीं, बल्कि तुर्की का राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एरदोगान है। एक समय था जब तुर्की आर्थिक और राजनीतिक रूप से स्थिर था। लेकिन जैसे-जैसे एरदोगान की सत्ता बढ़ी, तुर्की का पतन शुरू हो गया।
तुर्की पहले ऐसा नहीं थाः -
तुर्की कभी एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था। महिलाओं के पास अधिकार थे, प्रेस स्वतंत्र था और न्यायपालिका निष्पक्ष थी। ओटोमन साम्राज्य के इतिहास और उसके भौगोलिक स्थान ने तुर्की को व्यापार के लिहाज से एक महाशक्ति बनने की संभावना दी थी।
लेकिन 2013 के बाद से स्थिति ः -
एरदोगान की आर्थिक गलतियाँ
ब्याज दरें घटाना, जब उन्हें बढ़ाना चाहिए था: -
महंगाई बढ़ने पर दुनिया के सभी देश ब्याज दरें बढ़ाते हैं ताकि खर्च कम हो और मुद्रास्फीति थमे। लेकिन एरदोगान ने इसे “हराम” बताया और ब्याज दरें कम कर दीं। इससे तुर्की में हाइपरइन्फ्लेशन हुआ और मुद्रा की कीमत गिरती चली गई।
विदेशी निवेशकों को डराना: -
2016 के असफल कूप के बाद एरदोगान ने हजारों पत्रकारों, जजों और सैनिकों को जेल में डाल दिया। इससे निवेशकों को लगने लगा कि यह देश राजनीतिक रूप से अस्थिर है — और उन्होंने अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया।
ध्यान भटकाना: -
जब अर्थव्यवस्था सँभल नहीं रही थी, तब एरदोगान ने धार्मिक भावनाओं को भड़काया और खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता साबित करने की कोशिश की। इसी वजह से उसने पाकिस्तान का साथ दिया — और भारत के विरोध में खड़ा हो गया।
भारत के लिए सबकः -
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं होता, बल्कि मज़बूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका, और जवाबदेह नेतृत्व जरूरी होता है। अगर एक देश की सत्ता केवल एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो जाए, तो वह देश जल्द या देर से पतन की ओर बढ़ता है — जैसा तुर्की के साथ हुआ। भारत को इस स्थिति से सबक लेना चाहिए और अपने लोकतांत्रिक ढांचे को और भी मज़बूत करना चाहिए।
अंत मेंः -
तुर्की की आर्थिक बर्बादी और उसकी भारत विरोधी विदेश नीति ने उसे न केवल आर्थिक रूप से कमजोर किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग भी कर दिया है। वहीं भारत ने अपने शांतिपूर्ण और मददगार रुख से दुनिया में भरोसेमंद साथी की पहचान बनाई है।अब तय हमें करना है — हम तुर्की जैसी नीतियाँ अपनाएँ या सबक लें और आगे बढ़ें।
धन्यावाद्




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