परिवार संग एक यादगार यात्रा: धर्मशाला का त्रिउंड ट्रेक || Triund Trek Dharmshala

 परिवार संग एक यादगार यात्रा: धर्मशाला का त्रिउंड ट्रेक



नमस्कार साथियों,

उम्मीद करता हूँ आप सब कुशल-मंगल होंगे।
आज मैं आपको अपने साथ लेकर चल रहा हूँ एक ऐसे ट्रेक पर, जो बहुत समय से मेरी Wish List में थात्रिउंड ट्रेक, धर्मशाला के पास स्थित एक खूबसूरत स्थल, जहाँ का हर मोड़ एक नई याद बनकर दिल में बस जाता है।

मैं स्वयं जिला काँगड़ा (हिमाचल प्रदेश) से हूँ, और शायद इसी वजह से त्रिउंड मेरे लिए "घर जैसा" ही था। फिर भी न जाने क्यों, बरसों से इसे करीब से देखने का मौका नहीं मिल पाया। आखिरकार, 20 अप्रैल 2025 को मैंने अपने परिवार के सदस्यों सहित इस बहुप्रतीक्षित ट्रेक की शुरुआत की ।

शुरुआत की हलचलें और पहला मोड़ः -

इस ट्रैक में जाने के लिए मेरी औऱ मेरी पत्नी की योजना थी हमनें सोचा था कि 19 अप्रैल की दोपहर को घर से निकलेगें तथा धर्मशाला पहुँचकर शाम को ही ट्रेक शुरू कर देंगे, लेकिन हमारे साथ जुड़े परिवार के अन्य सदस्य भी, एक दम से बनी अतिरिक्त सदस्यों की योजना से घर से निकलने में ही काफी विलंब हो गया । हमने तय किया था कि ट्रेक की शुरुआत डिगूं माता मंदिर से करेंगे, जो धर्मकोट से लगभग 03 किलोमीटर ऊपर एक कच्चे रास्ते को पार करके पहुँचा जाता है। हमारे पास एक टैंट और दो स्लीपिंग बैग थे, बाकी इंतज़ाम त्रिउंड पहुंचकर करने की योजना थी जिसके लिए मैनें पहले ही किसी जानने वाले को कहा था ।

शाम के करीब 6 बजे हम डिगूं माता मंदिर पहुंचे, लेकिन अंधेरा होने को था और मौसम का मिज़ाज भी कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। वहीं जिन अंकल से मुलाकात करने थी वो खुद तो थे नहीं लेकिन उनके सहकर्मी से बात हुई उससे मैनें टैंट व कुछ स्लीपींग बैग की मदद मांगी, लेकिन अंकल तो हमें बच्चों को साथ देखकर और रात के समय में ट्रैक करने के लिए  उन्होंने सलाह दी कि अभी ट्रेक ही करें तो बेहतर है क्योकिं रास्ते में जंगली जानवर हो सकते हैं और रात को चढ़ाई जोखिम भरी हो सकती है और छोटे बच्चों के साथ काफी मुश्किल भी होगी और ऊपर नेटवर्क की उपल्बधता नहीं है तो शायद जब तक आप ऊपर पहुँचो टैंट और स्लीपींग बैग भी न मिले । यह सब सुनकर और मौसम का मिजाज देखकर हमने भी अंकल की बात मानकर ट्रेक को अगली सुबह तक टाल दिया। उन्होंने हमारे ठहरने की व्यवस्था एक होटल में करवा दी । होटल से धर्मकोट की रोशनी और पहाड़ों का नज़ारा लाजवाब था। ठंडी हवाएं चल रही थीं, हमने गर्मागरम चाय मंगवाई और सूर्यास्त का नज़ारा लेते हुए एक अलग ही सुकून महसूस किया ।

कुछ समय बाद कपड़े बदले और रात का खाना खाया और उसके बाद हम सभी ने लूडो खेली, लेकिन जैसे ही मुझे हारने का अहसास हुआ, मैं बहाना बनाकर सोने चला गया। अगली सुबह जल्दी उठने का प्लान था, इसलिए अलार्म 5 बजे का लगाकर सो गया बाद में पता चला लूड़ो को विजेता जीजा श्री रहें है । 

बारिशठंड और हँसीएक अलग शुरुआत

सुबह उठेतैयार हुए और बिना ज़्यादा सामान के जल्दी निकलने के लिए तैयार हुए लेकिन प्रकृति की हमसे अलग ही योजना थी जैसे ही कमरे से निकलेबारिश शुरू हो गई। थोड़ी देर रुकेफिर फैसला किया कि अब टैंट और खाने का थोड़ा सामान भी साथ रखेंगे । बच्चों के लिए रेनकोट भी ले लिएउन्हें देखकर लग रहा था जैसे कोरोना के समय की PPT Kit पहन रखी हो पर जैसे ही बारिश थो़ड़ी कम हुई हम ट्रैक के लिए निकल पड़े ।



हमारी सबसे छोटी बेटी दिविशा, सिर्फ दो साल की है, जिसे मैंने पूरे ट्रेक के दौरान अपने कंधों पर उठाकर ही चलाया। करीब 500 मीटर ही चले थे कि बारिश फिर से तेज हो गई। हमारे पास न छाता था, न कोई सिर ढकने के लिए वहां पर कोई जगह, शुक्र रहा कि हम अपने साथ टैंट ले आए थे । उसे निकालकर सभी उसके नीचे घुस गए ।



वहाँ, उस टैंट के अंदर, बारिश के बीच हम एक-दूसरे के चेहरे देखकर हँसते जा रहे थे । हमारे बीच सभी का यह पहला ट्रेक अनुभव था, और यह शुरुआत किसी एडवेंचर फिल्म जैसी लग रही थी और अभी रास्ता बहुत ज्यादा था । 

त्रिउंड की ओर बढ़ते कदम

बारिश थमी तो फिर से चढ़ाई शुरू की। त्रिउंड ट्रेक अब तक किए गए ट्रेक्स में सबसे आसान लगा। रास्ता अच्छा बना हुआ है, चढ़ाई धीरे-धीरे होती है और जगह-जगह बोर्ड लगे हैं कि आपने कितना सफर तय कर लिया है और कितना बचा हैजो मनोबल बनाए रखने में मदद करते हैं।

हालांकि एक चीज़ की कमी महसूस हुईपीने के पानी की। आमतौर पर पहाड़ी ट्रेक्स में कहीं न कहीं पानी का स्रोत मिल जाता है, लेकिन यहाँ एक जगह पानी था, वो भी वापसी में सूख गया।

रास्ते में छोटा सा ब्रैक ।

गाने गाते हुए, बच्चों के साथ मज़ाक करते हुए कब हम ऊपर पहुँच गएपता ही नहीं चला ।

त्रिउंड की ठंडी हवा और गर्म कॉफ़ी 

ऊपर पहुँचते ही सबसे पहले कॉफी की याद आई, लेकिन तब ख्याल आया कि दूध तो लाना भूल गए! शुक्र है वहाँ दुकान वाले भैया ने हमारी मदद की और थोड़ा दूध दे दिया। तेज ठंड में तुरंत टैंट लगाया गया और दो लोगों के टैंट में सात लोग जैसे-तैसे समा गए ।






कॉफी बनाकर पी और ठंड से थोड़ी राहत मिली। फिर जल्दी-जल्दी मैगी और सैंडविच तैयार किए। जैसे ही मौसम थोड़ा खुला, हम टैंट से बाहर निकले, हमने फोटो खींची, डांस किया, और हर पल को यादगार बना दिया । 

                            


सबसे खास रहा वहाँ बजरंगबली जी की मूर्ति
जिसके सामने खड़े होकर एक अद्भुत श्रद्धा का अनुभव हुआ।


वापसी की राह और गुलाबी बुराँश

हालांकि आगे और ट्रेक्स के रास्ते थे, लेकिन बच्चों के साथ वहाँ तक जाना संभव नहीं था। इसलिए हम त्रिउंड से नीचे लौटने लगे। रास्ते में हमें गुलाबी बुराँश के पेड़ दिखेहमने कुछ फूल तोड़कर बैग में रख लिए। बुराँश की चटनी का स्वाद तो बस वही समझ सकता है जिसने खाया हो।

नीचे होटल पहुँचे, थोड़ी देर आराम किया और फिर निकल पड़ेघर की ओर


अंत में...

अगर मैं अकेला गया होता, तो शायद यह अनुभव इतना खास न होता। लेकिन परिवार के साथखासतौर पर बच्चों के संगयह ट्रेक जीवन की सबसे खूबसूरत यादों में से एक बन गया।

त्रिउंड ट्रेक, मेरे लिए सिर्फ एक चढ़ाई नहीं, बल्कि हँसी, ठंड, बारिश और प्यार से भरी यादों की एक कहानी बन गया।



धन्यवाद!


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